पिताजी

पिताजी
स्‍व. डॉ. दिनेश चन्‍द्र वाचस्‍पति

शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

पिताजी को जिम्‍मेदारी का दोहरा अहसास

बात पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश की आज़ादी के युद्ध के समय की है.पापा आप उस युद्ध में गए थे, लड़ने के लिए, मुझे याद है, आपका वो पत्र जो आया था, काफी इंतजार के बाद,जिसका इंतजार पूरा परिवार कर रहा था. दादी हमेशा डाकिये का इंतजार करती थी. कभी तो कोई चिट्ठी लेकर आएगा ? मुझे कुछ सही खबर बताएगा. एक दिन आपका पत्र डाकिया लेकर आया. उसे सभी घर वालों के सामने खोल कर पढ़ा गया.आपने लिखा था, सब कुछ ठीक-ठाक है. दादी के चेहरे पे एक सुकून का भाव था. उस पत्र में लिखी एक बात मुझे आज तक याद आती है.'लल्लू को बाहर मत घूमने देना गर्मी का समय है, तबियत ख़राब  हो जायेगी. उसे घर से बाहर मत निकलने देना,बंद करके रखना".आज मैं सोचता हूँ कि कितना ख्याल रखते थे आप हमारा.एक तरफ युद्ध दूसरी तरफ परिवार. और काफी दिनों के बाद एक पत्र एवं उसमें भी मेरी चर्चा. उस समय मुझे लगता था कि मेरे पापा  कसाई है मुझे घर से बाहर खेलने भी नहीं जाने देते. और तो और युद्ध में गए हैं, वहां से भी हुकुम मेरे लिए ही आ रहा है. नासमझ था मैं, उस समय मुझे पता नहीं था कि एक पिता की क्या जिम्मेदारी होती है ? आज आप नहीं हैं. तब मुझे आपकी जिम्मेदारियों का अहसास होता है.आप एक नहीं युद्ध के दो-दो मोर्चों पर अपनी लड़ाई लड़ रहे थे और अपने लडाई जीती भी. आज मै एक मोर्चे पर ही अपनी काबिलियत साबित करने के लिए जूते घिस रहा हूँ. लेकिन विजय कहीं नज़र नहीं आती. आज सोचता हूँ, कैसे किया होगा आपने इतना सब ? और जब आप आये उस दीवाली को मैं पटाखों की जिद कर रहा था, आपने मुझे पटाखे दिलाये, २२ रूपये के. कितने सारे पटाखे थे वो, जैसे हम पटाखों की पूरी दुकान ही खरीद कर ले आये हों. एक बड़े बक्से में भर कर दिये थे उसने. उस दीवाली हमने खूब पटाखे चलाये थे.शायद युद्ध की विजय और आपके आने की ख़ुशी के पटाखों में कुछ ज्यादा ही रोशनी एवं आवाज थी. जब -जब दीवाली आती है।  मुझे आप खूब याद आते हैं. आज भी आप याद आ रहे हैं.आप दोपहर में मैं जब सोया था तो मुझे सपने में भी सब फौजी ही फौजी दिख रहे थे. उनमें आप भी थे मैं बहुत खुश था कि  आज दीवाली है और मेरे पापा फिर वापस आ गए हैं, मुझे पटाखे एवं नए कपडे दिलाने के लिए.क्योंकि जब से आप हमें छोड़ कर गए हैं,  तब से हमारी जिन्दगी से रंग-ख़ुशी, वो पटाखों के धमाके, वो रोशनी की लड़ियाँ, वो फुलझडि़यां, सब चले गए. तब से हमने दीवाली पर नए कपडे नहीं पहने है. ना मम्मी ने, ना मेरे छोटे भाई ने, ना मैंने. आज इतने बरसों के बाद  भी दीवाली पर वो उमंग और मस्ती कभी नहीं आई और आपके बिना आएगी भी नहीं.मुझे पता है, आप इतनी दूर जा चुके हैं हमसे, जहाँ से वापस आना भी संभव नहीं है.फिर भी हम प्रत्येक दीवाली को आपका इंतजार करते रहेंगे जिन्दगी भर, नए कपडों और आपके प्‍यार भरे, नेह पूरित पटाखों के लिए.......................पापा

10 टिप्पणियाँ:

vinay 17 अक्तूबर 2009 1:42 pm  

माता पिता का असीम स्नेह अपने बच्चो के हित में ही तो होता है ।

vinay 17 अक्तूबर 2009 1:42 pm  

माता पिता का असीम स्नेह अपने बच्चो के हित में ही तो होता है ।

योगेश स्वप्न 17 अक्तूबर 2009 3:15 pm  

hriday sparshi rachna.

AlbelaKhatri.com 17 अक्तूबर 2009 8:23 pm  

अति उत्तम

वाह !


आपको और आपके परिवार को दीपोत्सव की

हार्दिक बधाइयां

परमजीत बाली 17 अक्तूबर 2009 8:56 pm  

बहुत भावपूर्ण रचना।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 17 अक्तूबर 2009 9:15 pm  

यह दिया है ज्ञान का, जलता रहेगा।
युग सदा विज्ञान का, चलता रहेगा।।
रोशनी से इस धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!

Pandit Kishore Ji 18 अक्तूबर 2009 1:02 pm  

waah bahut badiya likha hain
sach hi hain mata pita ka sneh hota hi aisa hain

शरद कोकास 19 अक्तूबर 2009 6:10 am  

पापा कही नही जाते वो तो हमेशा बच्चो के पास ही होते है जैसे हम अपने बच्चोके पास हमेशा रहेंगे उनके हर कदम पर उन्हे रास्ता दिखाते हुए ।

JHAROKHA 23 अक्तूबर 2009 8:06 pm  

मर्मस्पर्शी रचना…दुनिया की कोई भी खुशी माता-पिता से बढकर नहीं होती…सही कहा आपने ॥ अपनों के बिना हर खुशी अधूरी है।

गिरीश"मुकुल" 20 जून 2011 9:37 am  

पितृ-दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ

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