पिताजी

पिताजी
स्‍व. डॉ. दिनेश चन्‍द्र वाचस्‍पति

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

लिखावट सुधारें : अंगुलियों को हुनरमंद बनायें

बहुत कोशिश की
बहुत खाई डांट
पर नहीं सुधरी लिखावट
सोलह दूनी आठ।

पर अब होंगे ठाठ
नीचे इमेज को बांच
लिखना हो हिंदी में
या लिखें अंग्रेजी में
शब्‍दों के मोती बनायें ।

जो लिखते हैं
कंप्‍यूटर पर  निरंतर
उनको नहीं पड़ता अंतर
पर अच्‍छा है यह जंतर
लिखावट की जिंदगी
आह से अहा हो जाती है
जब लिखावट सुधर जाती है।

अपने तक मत रखें सीमित
इस जानकारी को बनायें असीमित
लिखने में आ जाती हैं सलवटें
अब मत बदलें करवटें
सलवटें दूर करें।

अहा जिंदगी मासिक पत्रिका अगस्‍त 2010 से साभार।

4 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 31 जुलाई 2010 7:21 am  

उपयोगी जानकारी है!

रेखा श्रीवास्तव 31 जुलाई 2010 1:08 pm  

sahi hee likha hai, jaankari ke liye dhanyavad.

mridula pradhan 1 अगस्त 2010 11:38 am  

theek baat.

डॉ. हरदीप संधु 6 अगस्त 2010 1:06 am  

वाह क्या बात कही है.....
यह तो बहुत जरूरी भी है।
हमारी लिखावट हमारे मन का आईना है।

पोस्ट को पढ़ने के लिये नीचे कृपया लिंक पर क्लिक करें -

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