पिताजी

पिताजी
स्‍व. डॉ. दिनेश चन्‍द्र वाचस्‍पति

शनिवार, 7 अगस्त 2010

पिता यानि बेटी के जीवन का शक्ति स्तंभ

भावनात्मक पलों में आंसू छिपाने के लिए मुंह फेरकर खड़े हो जाने वाले परिवार के पुरुष सदस्यों से जुड़े स्नेही रिश्तों की बातें ज़रा कम ही की जाती हैं। ऐसे में आज बात मनोबल और मार्गदर्शन के उस रिश्ते की जिसमें पिता का प्रेम बेटी के लिए शक्ति का स्रोत है तो बेटी का स्नेह पिता के लिए जीने की ताकत। शायद यही वजह है कि बच्चों की सफलता पर गर्वित और असफलता पर मज़बूत और धर्यवान बने रहने वाले पापा के व्यक्तित्व से बेटियां आजीवन प्रभावित रहती हैं।
सच है की बेटी को भावनात्मक विचारों और संस्कारों से रूबरू उसकी माँ कराती है पर उसे जीवन का पाठ पढ़ाने में पिता की भूमिका भी कम नहीं होती। व्यवहारिक जीवन की पहली सीख तो बेटी को पापा से ही मिलती है। पहली बार घर के बाहर की दुनिया हर बेटी पापा की उंगली थाम कर देखती है। पापा का हाथ सिर पर हो तो उसे पूरा जीवन सुरक्षित लगता है। ज़िंदगी के सफ़र में जब भी एक बेटी के कदम लड़खड़ाते है पिता आगे बढ़कर उसे थाम लेते हैं। वो पापा ही होते हैं, जो बेटियों के जीवन की नींव को मज़बूत बनाकर उनमें आगे आने वाली परिस्थितियों से जूझने की ताकत भर देते हैं।
हमारे घरों में वैसे भी देखने में आता है की पिता का बेटी से गहरा स्नेह होता है। बिना कहे ही बेटी के मन की बात समझने वाले पापा ही तो होते हैं। एक बेटी के जीवन में पापा की जगह उस कनवास की तरह होती है जो भले ही पृष्ठभूमि में रहे पर उसके बिना बेटी के जीवन की तस्वीर की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कभी नरम तो कभी गरम अंदाज़ में बेटी को अनुशासन और व्यवहारिकता का पाठ पढ़ाने वाले पापा ही बेटी के सपनों को पंख फ़ैलाने का आसमान देते हैं। मनोबल और मार्गदर्शन भरे इस रिश्ते की मिठास को समझने के लिए इतना ही काफी है की पिता से मिलने वाले स्नेह का संबल बेटी को जिंदगी भर संघर्ष करने और आगे बढ़ने की ऊर्जा देता है।
आज के दौर में भी सशक्त बनती बेटियों के पीछे उनके स्नेहिल पिताओं का भरपूर सहयोग है। क्योंकि ऊंची तालीम हासिल की बात हो या करियर बनाने की बेटी पीछे रखने का ख्याल भी उनके ज़ेहन में नहीं होता। इसी का परिणाम हैं की आज हमारे समाज में पिता से प्रेरणा लेने वाली ऐसी बेटियों की भी कमी नहीं है जिन्होंने उन्हीं के नक़्शे कदम पर चलकर मिसालें कायम की हैं।
तभी तो संसार की हर बेटी के लिए पिता के मज़बूत कंधों के सहारे से बढ़कर कोई सहारा नहीं होता। यह बंधन एक ऐसा शक्ति स्तम्भ है जिससे बेटी को ताउम्र हौसले से जीने का जज्बा मिलता है........... यहाँ तक की पिता के दुनिया छोड़ देने के बाद भी...............


2 टिप्पणियाँ:

वाणी गीत 7 अगस्त 2010 7:11 am  

यह बंधन एक ऐसा शक्ति स्तम्भ है जिससे बेटी को ताउम्र हौसले से जीने का जज्बा मिलता है........... यहाँ तक की पिता के दुनिया छोड़ देने के बाद भी...............

सत्य यही है ...!

budh.aaah 14 सितम्बर 2010 11:59 am  

Haan mae bilkul akela mahsoos karti hoon apneaap koh aaj. Merey Pitaji ko gaye aaj 1 mahina 5 din ho gaye hain..aur lagta hae zindagi kuch adhoori si reh gayee hae.
Per upar wale koh dhanyawaad ki maa ka saaya abhi bhi sur per hae..

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