पिताजी

पिताजी
स्‍व. डॉ. दिनेश चन्‍द्र वाचस्‍पति

सोमवार, 2 मई 2011

हां, सोचती हैं उंगलियां : रामदरश मिश्र

कलम हैं

या हैं उंगलियां
बनती हैं सुविचार

मानस के आर
या होती हैं पार
सुविचार बस जाते हैं
सज्‍जन के मन में
दुर्जन के जन में
जन को बनायें
सज्‍जन
हिंदी ब्‍लॉगरों का
ऐसा है मन।

2 टिप्पणियाँ:

Patali-The-Village 3 मई 2011 7:25 am  

बहुत सुन्दर भावना पूर्ण रचना| धन्यवाद|

प्रेम सरोवर 3 मई 2011 8:11 am  

आपके पोस्ट पर पहली बार आया हूं।अच्छा लगा। मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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