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कर लीजिए
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न हिचकिचाइये
एक बार फिर से
माउस से क्लिक
करने का कष्ट
ऊंगली से दबाइये
न कि उठाइये।
बहुत अच्छा लेख है, वैसे ऐसे वाकये (जिन्हें पापा से छुपाया गया हो)मेरे साथ भी कई हुऐ हैं और कई बार हुए हैं स्कूल के दिनों से ही मुझे अलग अलग तरह की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का शौक़ था जिसके लिए घर में पापा को बिना बताये हुए जाना पड़ता था क्योंकि उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं था ये सब करना उनको लगता था कि बस पढ़ाई ही की जाये ये सब बेकार की चीज़ें हैं लेकिन पापा से छुप कर ऐसा करने में मैं ज़रा भी संकोच नहीं करती थी मम्मी को बता कर या चाचा जी को बता कर घर से निकल जाती थी और कई इनाम कभी शील्ड, तो कभी दीवार घड़ी, तो कभी घर सजाने का सामान बतौर पुरस्कार में मिल जाता था जो उस समझ बहुत बड़ा पुरस्कार हुआ करता था...(आज भी है) लेकिन जैसे ही पापाजी उसे देखते बस बरस पड़ते क्या रखा है इन सब में टाइम की बर्बादी के सिवा कुछ नहीं है ये सब...इन सब से करियर नहीं बनता वगैराह वगैराह और मैं अपना सा मुंह लेकर अपने इनाम को साथ लेकर अपने कमरे में चली जाती और सोचती ये भी कोई तरीका है इतनी मेहनत से मैंने ये इनाम हासिल किया है सभी के माता पिता साथ आते हैं मैं तो अकेले ही जाती हूं तब भी पापाजी खुश नहीं होते...बहुत बुरा लगता था। लेकिन वहीं दूसरे या तीसरे दिन जब घर में मैं नहीं होती थी पापाजी मेरा ईनाम अपने किसी दोस्त या पड़ौस के अंकल को दिखा कर कहते थे देखो 1st आयी है हम तो मना करते हैं लेकिन फिर भी कुछ न कुछ करती ही रहती है पढ़ाई में भी किसी से कम नहीं है वगैराह वगैराह तब उत्तर में सामने बैठा व्यक्ती बोल देता था कि ज़रूर बड़े होकर नाम करेगी आपका उस समय पापाजी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता होगा कभी देखा नहीं लेकिन मम्मी हमेशा इन सब बातों की चश्मदीद गवाह हुआ करतीं थीं जो उस समय का आंखों देखा हाल बताया करतीं थीं, और इस तरह एक बार फिर मुझे हिम्मत मिल जाती थी पापाजी से छुप कर किसी अन्य प्रतियोगिता में जाने की....इसी छुपा छुपी का खेल खेलते खेलते मैं आगरा से दिल्ली आ गयी पत्रकारिता की और अब पिछले पांच सालों से इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में हूं करियर ठीक ठाक चल रहा है और संघर्ष जारी है साथ लेकिन अब वैसा मज़ा नहीं जो पापाजी से छुपकर सब काम करने में आता था। पापाजी भी अब समय के साथ ठोड़ा बदले हैं...उतने स्ट्रिक्ट नहीं रहे या यूं कहें कि अब उनका विश्वास सीधा मुझसे जुड़ गया है, क्योंकि अब मैं उनकी बेटी नहीं बेटा हूं...कुछ नहीं बदला तो उनका तारीफ करने का तरीका और उसकी गवाह आज भी मम्मी ही होती हैं.... बबिता अस्थाना सी वी बी न्यूज
3 टिप्पणियाँ:
फोटो बड़ी नहीं हो पा रही है अतः पढ़ना संभव नहीं हो पाया.
यह समस्या विदेशों में है, भारत में तो पढ़ी जा रही है और बढ़ी भी हो पा रही है।
बहुत अच्छा लेख है, वैसे ऐसे वाकये (जिन्हें पापा से छुपाया गया हो)मेरे साथ भी कई हुऐ हैं और कई बार हुए हैं स्कूल के दिनों से ही मुझे अलग अलग तरह की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का शौक़ था जिसके लिए घर में पापा को बिना बताये हुए जाना पड़ता था क्योंकि उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं था ये सब करना उनको लगता था कि बस पढ़ाई ही की जाये ये सब बेकार की चीज़ें हैं लेकिन पापा से छुप कर ऐसा करने में मैं ज़रा भी संकोच नहीं करती थी मम्मी को बता कर या चाचा जी को बता कर घर से निकल जाती थी और कई इनाम कभी शील्ड, तो कभी दीवार घड़ी, तो कभी घर सजाने का सामान बतौर पुरस्कार में मिल जाता था जो उस समझ बहुत बड़ा पुरस्कार हुआ करता था...(आज भी है) लेकिन जैसे ही पापाजी उसे देखते बस बरस पड़ते क्या रखा है इन सब में टाइम की बर्बादी के सिवा कुछ नहीं है ये सब...इन सब से करियर नहीं बनता वगैराह वगैराह और मैं अपना सा मुंह लेकर अपने इनाम को साथ लेकर अपने कमरे में चली जाती और सोचती ये भी कोई तरीका है इतनी मेहनत से मैंने ये इनाम हासिल किया है सभी के माता पिता साथ आते हैं मैं तो अकेले ही जाती हूं तब भी पापाजी खुश नहीं होते...बहुत बुरा लगता था। लेकिन वहीं दूसरे या तीसरे दिन जब घर में मैं नहीं होती थी पापाजी मेरा ईनाम अपने किसी दोस्त या पड़ौस के अंकल को दिखा कर कहते थे देखो 1st आयी है हम तो मना करते हैं लेकिन फिर भी कुछ न कुछ करती ही रहती है पढ़ाई में भी किसी से कम नहीं है वगैराह वगैराह तब उत्तर में सामने बैठा व्यक्ती बोल देता था कि ज़रूर बड़े होकर नाम करेगी आपका उस समय पापाजी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता होगा कभी देखा नहीं लेकिन मम्मी हमेशा इन सब बातों की चश्मदीद गवाह हुआ करतीं थीं जो उस समय का आंखों देखा हाल बताया करतीं थीं, और इस तरह एक बार फिर मुझे हिम्मत मिल जाती थी पापाजी से छुप कर किसी अन्य प्रतियोगिता में जाने की....इसी छुपा छुपी का खेल खेलते खेलते मैं आगरा से दिल्ली आ गयी पत्रकारिता की और अब पिछले पांच सालों से इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में हूं करियर ठीक ठाक चल रहा है और संघर्ष जारी है साथ लेकिन अब वैसा मज़ा नहीं जो पापाजी से छुपकर सब काम करने में आता था। पापाजी भी अब समय के साथ ठोड़ा बदले हैं...उतने स्ट्रिक्ट नहीं रहे या यूं कहें कि अब उनका विश्वास सीधा मुझसे जुड़ गया है, क्योंकि अब मैं उनकी बेटी नहीं बेटा हूं...कुछ नहीं बदला तो उनका तारीफ करने का तरीका और उसकी गवाह आज भी मम्मी ही होती हैं....
बबिता अस्थाना
सी वी बी न्यूज
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