पिताजी

पिताजी
स्‍व. डॉ. दिनेश चन्‍द्र वाचस्‍पति

रविवार, 19 जून 2011

पा या पापा नहीं, डैड तो बिल्‍कुल नहीं, हां पिताजी संबोधन मुझे अच्‍छा लगता है

बरस 1970। खबर मिलती है मुन्‍ना तुम्‍हारे पिताजी का एक्‍सीडेंट हो गया है। वे दोपहिए लेम्‍ब्रेटा स्‍कूटर पर मेरी मम्‍मीजी के साथ सिनेमा देखने गए थे। सिनेमा हाल इरोज़। जंगपुरा में अब भी है। नहीं हैं तो पिताजी नहीं हैं। मम्‍मीजी हैं और उन्‍हीं की हिम्‍मत और हौंसले के बल पर हम पांच भाई बहन। मैं सबसे बड़ा पर उम्र ग्‍यारह बरस और कुछ महीने।
मम्‍मी और पिताजी को सफदरजंग अस्‍पताल में भर्ती करवा दिया गया है। उनके स्‍कूटर को एक तेज आती हुई कार ने टक्‍कर मारी थी। उस समय हेलमेट प्रचलन में नहीं था परंतु आया न हो, ऐसा भी नहीं था। कानूनी रूप से पहनना अनिवार्य तो था ही नहीं।
मम्‍मी के शरीर पर, चेहरे पर चोटें आई थीं। वे बेहोश थीं परंतु अस्‍पताल में होश में आ गई थीं। उन्‍हें पिताजी की हालत के बारे में यही कहा गया कि ठीक हैं। पिताजी होश में भी नहीं आए। आए भी तो अर्धचेतन  अवस्‍था में ही। फोन था जिससे तिलक नगर स्थित छोटे चाचाजी को सूचित कर दिया था मैंने। और उन्‍होंने बुआजी और अन्‍य चाचाओं को। धीरे धीरे खबर बहुत तेजी से सब तक पहुंच गई।
पिताजी के सिर में चोट लगी थी। अंदर खून का रिसाव नहीं हुआ था। मुझे शायद दूसरे या तीसरे दिन अस्‍पताल में पिताजी के पास ले जाया गया। उनके सिर के दो ऑपरेशन हो चुके थे। परंतु उनकी स्थिति यथावत बनी रही। वे अर्धचेतन अवस्‍था में ही किसी को किसी के नाम से पुकारते रहे।
मम्‍मी को वे बार बार पुकारते थे। मैं सामने पहुंचा तो बोले तेताला। मैं नहीं समझ पाया। आज तक इस शब्‍द का अर्थ नहीं समझ पाया हूं। खूब सारे शब्‍दकोष देखे। अब तो इंटरनेट है, अब भी देखता हूं परंतु इस एक शब्‍द के अर्थ की तलाश अब भी जारी है। पहला काव्‍य संकलन तेताला नाम से ही प्रकाशित किया और ब्‍लॉग भी पहला इसी नाम से बनाया।
6 मई 1970 को पिताजी का निधन हो गया। उनका चित्र इस ब्‍लॉग पर आप देख ही रहे हैं। इसके बाद का मम्‍मी का संघर्ष पर उन्‍होंने बड़े जीवट से हम सबको पाला पढ़ाया। आज हम सब अपने अपने परिवार के साथ प्रसन्‍न हैं।
अवश्‍य ही यह पिताजी का आशीर्वाद है। बहुत सारे संस्‍मरण हैं। सारे एक साथ तो साझा नहीं कर सकता।  जब यह ब्‍लॉग बनाया था तो यही आशय था कि सबके पिताजी विषयक संस्‍मरण लिख पढ़ सकेंगे। उस सब में यह ब्‍लॉग सफल हो रहा है।
पिता शब्‍द के साथ यह तो है कि जी लगाना नहीं पड़ता, खुद ही लग जाता है। मुझे तो पिताजी कहना ही भाता है। आपको क्‍या लगता है कि पापा कहना सही है या पिताजी, पा या डैड या अन्‍य कोई संबोधन। आओ आज इसी पर विचार करते हैं। 

23 टिप्पणियाँ:

ANSHUL THE GREAT 19 जून 2011 5:36 pm  

kehne ke liye shabd nahin hain

अमि'अज़ीम' 19 जून 2011 5:37 pm  

badi hi marmik rachna hai.....
pita ke priti pram ....
mata ka samrpan..
ke parivaar ke ban-ne ki kahaani..
thodi der ke liye gala rundh gya...
http://amiajimkadarkht.blogspot.com/2011_01_28_archive.html
ye link dekhiye ..
shaayd aap ko acchi lage...or pita ji yaade taja ho udde..

शिवम् मिश्रा 19 जून 2011 5:50 pm  

अविनाश भाई , आज 'तेताला' का मतलब समझ आ गया ... वैसे आज के दौर को देखते हुए मेरी समझ से इस बात का कोई मतलब नहीं रह जाता कि हम अपने अपने वालिद साहब को क्या कह कर पुकारते है ... जब तक संवाद होता रहे सब चलता है ... आजकल फेसबुक और ट्विटर पर तो हम दुनियां को बताते है ... " Going for movie !! " पर जैसे ही घर के किसी ने पूछ लिया भाई कहाँ चले ... हमें बहुत बुरा लग जाता है ... यह सब संवाद की कमी के कारण ही है ... इस लिए जिस नाम से भी पुकारो ... पुकारो जरुर !!

आप को फादर'स डे की बहुत बहुत शुभकामनाएं !

aarkay 19 जून 2011 6:05 pm  

बहुत ही मार्मिक संस्मरण. दिवंगत पिता जी को इस प्रकार से स्मरण करना ही फादर डे मनाना है . सौभाग्य से जीवित हों तो किसी भी प्रकार से उनके प्रति सम्मान व कृतज्ञता प्रकट की जा सकती है. हाँ , साधन संपन्न लोगों के लिए इस अवसर पर उपहार या तोहफा खरीदने के लिए बाज़ार खुला है ही !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 19 जून 2011 6:26 pm  

पितृ-दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।

वन्दना 19 जून 2011 7:29 pm  

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (20-6-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

Raj 19 जून 2011 7:42 pm  

अविनाश जी ,
आपने तो भावुक कर दिया ,सुबह जिस अवसाद का कारण न समझ सका वह अब पारदर्शी जल की तरह सामने है |आभार और धन्यवाद अपनी अंतरंग भावनाओं का साझीदार बनाने हेतु....आशीष पाण्डेय "राज"

एस.एम.मासूम 19 जून 2011 9:01 pm  

अविनाश जी आप का अपने पिताजी को याद करना अच्छा लगा. पापा और पिताजी कि कोई तुलना नहीं. पिताजी मैं इज्ज़त भी है और मुहब्बत भी.

इस्मत ज़ैदी 19 जून 2011 11:26 pm  

अविनाश जी ,
ये संस्मरण केवल कुछ शब्द नहीं हैं बल्कि आप की भावनाओं का ,दु:ख का और अशांत मन का प्रकटीकरण है
पिता जी को श्रद्धांजलि अर्पित और एक मां की हिम्मत और जीवट को नमन करती हूं

राज भाटिय़ा 20 जून 2011 12:39 am  

बहुत भावुक बना दिया आप ने पिता जी को श्रद्धांजलि !!!!

Kajal Kumar 20 जून 2011 6:25 am  

नि:शब्द

वाणी गीत 20 जून 2011 6:40 am  

तेताला का शाब्दिक अर्थ भले ना समझे , भावना समझी जा सकती है ...
मार्मिक संस्मरण !

Archana 20 जून 2011 7:36 am  

एक ही बात समझ आई....किसी भी नाम से पर पुकारों जरूर........

अमित श्रीवास्तव 20 जून 2011 7:42 am  

bahut hi maarmik sansmaran,,


moreover "tetaala" ka rahasya khul gaya, mai ab tak kai baar prayaas kar chukaa thaa ,iskaa arth dhundhne ke liye...

गिरीश"मुकुल" 20 जून 2011 9:35 am  

पितृ-दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ
ब्लाग फ़ार वार्ता पर कल देखिये

डॉ॰ मोनिका शर्मा 20 जून 2011 9:52 am  

मन को छू गयी आपकी पोस्ट...... पिताजी को नमन

संगीता स्वरुप ( गीत ) 20 जून 2011 10:27 am  

अविनाश जी ,

अब तो तेताला भावनात्मक रूप से जुड गया है ... बहुत आत्मीय प्रस्तुति ... पिता को किसी भी शब्द से पुकारें बस पुकारें ज़रूर ..आज कल तो घरों में आपस में संवाद ही खत्म हो रहे हैं

संगीता पुरी 20 जून 2011 11:17 am  

पितृ दिवस पर आपके द्वारा की गयी इस सुंदर प्रस्‍तुति की चर्चा ब्‍लॉग4वार्ता में की गयी है !!

Arunesh c dave 20 जून 2011 11:45 am  

आपके पिताजी को श्रद्धांजली और माताजी को प्रणाम जिन्होने निश्चित ही दूरूह कर्तव्य को अंजाम दिया

निवेदिता 20 जून 2011 12:06 pm  

मर्मस्पर्शी संस्मरण .....संबोधन कुछ भी हो पिता के प्रति भाव तो वही रहेंगे !

Surendra shukla" Bhramar"5 20 जून 2011 8:31 pm  

अविनाश वाचस्पति जी पिता जी को श्रद्धांजलि मेरी तरफ से भी -मार्मिक लेख , तेताला आज समझ आया यादें जुडी हैं पिता श्री की ,पिताजी संबोधन निश्चित ही सुन्दर है -वैसे पुत्र का प्यार बना रहे संबोधन कुछ भी कर ले क्या फर्क पड़ता है -शुभ कामनाएं
शुक्ल भ्रमर ५

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 20 जून 2011 10:43 pm  

ह्रदयश्पर्सी संस्मरण ...............

'पिताजी 'संबोधन ह्रदय से जुड़ा हुआ लगता है जबकि अन्य नहीं |

मीनाक्षी 21 जून 2011 12:22 am  

मर्मस्पर्शी संस्मरण दिल को भावुक कर गया..आप पिताजी कहें या हम डैडी...उनसे बिछुड़ने का दुख तो एक सा ही हैं...

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