पिताजी

पिताजी
स्‍व. डॉ. दिनेश चन्‍द्र वाचस्‍पति

रविवार, 19 जून 2011

मेरे पिता ! .......




तुम्हारे वरद-हस्त 

(डॉ.)  कविता वाचक्नवी

(अपने संकलन "मैं चल तो दूँ" (२००५) से )







मेरे पिता !
एक दिन
झुलस गए थे तुम्हारे वरद-हस्त,
पिघल गई बोटी-बोटी उँगलियों की।


देखी थी छटपटाहट
सुने थे आर्त्तनाद,
फिर देखा चितकबरे फूलों का खिलना,
साथ-साथ
तुम्हें धधकते
किसी अनजान ज्वाल में
झुलसते
मुरझाते,


नहीं समझी
बुझे घावों में
झुलसता
तुम्हारा अन्तर्मन



आज लगा...
बुझी आग भी
सुलगती
सुलगती है
सुलगती रहती है।
--



4 टिप्पणियाँ:

अविनाश वाचस्पति 19 जून 2011 11:08 pm  

अनुभव तब
अहसास अब।

निर्मला कपिला 20 जून 2011 8:31 am  

भावमय अभिव्यक्ति।

वीना 20 जून 2011 4:56 pm  

सुंदर भाव....

G.N.SHAW 20 जून 2011 7:25 pm  

मार्मिक

पोस्ट को पढ़ने के लिये नीचे कृपया लिंक पर क्लिक करें -

About This Blog

  © Blogger template 'Grease' by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP