मेरे पिता ! .......
तुम्हारे वरद-हस्त
--(डॉ.) कविता वाचक्नवी
(अपने संकलन "मैं चल तो दूँ" (२००५) से )


मेरे पिता !
एक दिन
झुलस गए थे तुम्हारे वरद-हस्त,
पिघल गई बोटी-बोटी उँगलियों की।
देखी थी छटपटाहट
सुने थे आर्त्तनाद,
फिर देखा चितकबरे फूलों का खिलना,
साथ-साथ
तुम्हें धधकते
किसी अनजान ज्वाल में
झुलसते
मुरझाते,
नहीं समझी
बुझे घावों में
झुलसता
तुम्हारा अन्तर्मन
आज लगा...
बुझी आग भी
सुलगती
सुलगती है
सुलगती रहती है।

4 टिप्पणियाँ:
अनुभव तब
अहसास अब।
भावमय अभिव्यक्ति।
सुंदर भाव....
मार्मिक
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