पिताजी

पिताजी
स्‍व. डॉ. दिनेश चन्‍द्र वाचस्‍पति

रविवार, 24 जुलाई 2011

पिता बिना कैसे जिया?

जो चीज हमें उपलब्ध होती है हम उसकी कीमत नहीं जानते है और जिन्हें वो मिली ही नहीं उनसे जानो उसकी कीमत क्या होती है?
बात पिछले महीने की है। फादर्स दे वाले दिन मेरे पति के पास फोन आया - 'हैपी फादर्स डे पापा" । फिर एक ख़ामोशी - मेरे दो ही बेटियाँ है उनके फ़ोन सुबह आ ही चुके थे। उससे आगे फ़ोन करने वाले ने कोई बात नहीं की।
शाम को बेटी ने बताया कि सुबह पवन ने फ़ोन किया था। वह इतना भावुक हो रहा था कि आगे बात करता तो शायद रो पड़ता । पवन हमारा होने वाला दामाद है। उससे आगे बात क्यों नहीं की? क्योंकि जब वह बहुत ही छोटा था तब उसके पापा का निधन हो गया था। माँ कि अंगुली पकड़ कर चलना सीखा और अपने ही बूते यहाँ तक पहुंचा । लेकिन पापा शब्द से जो एक लगाव था - वह उसको भावुक कर गया। जीवन में पहली बार तो उसको पापा कहने वाला कोई मिला था। फिर उससे आगे बोल ही नहीं पाया। इस शब्द की क्या कीमत है? इसे वही जान सकता है जिसने इसके बिना जीवन जिया है। नहीं तो ओल्ड एज होम में बहुत सारे पापा मिलेंगे , जिन्होंने ऐसे कितने बेटे लायक बना कर इस जीवन में तैयार किये हैं और फिर इस दिन वे अकेले बैठे हैं। उनको विश करने वाला कोई भी नहीं है क्योंकि उनके विश करने वाले तो अपने बच्चों कि विश ले रहे हैं और खुश हो रहे हैं क्योंकि अभी वे बच्चे छोटे हैं और कल कि उन्हें खबर नहीं है।
काश हम इसको खुद समझ सकें कि ऐसे ही कोई फादर्स डे कल हमें जीवन की धरोहर बनेगा। वे अमर होकर नहीं आये हैं, जब तक हैं उन्हें हम प्यार तो दे सकते हैं। लेकिन नहीं अपने पिता बनते ही उन्हें अपने पिता बोझ लगाने लगते हैं भले ही उन्होंने पिता को दादाजी कि सेवा करते हुए देखा हो लेकिन वो पिता की बेवकूफी थी। पहले अपना परिवार देखना चाहिए फिर माँ बाप को। यही तो इस पिता ने भी किया था फिर कहाँ चूक हो गयी? चलो हम इस चूक को सुधारने के लिए लोगों से समझाएं।

7 टिप्पणियाँ:

वीना 24 जुलाई 2011 10:37 pm  

काश आज के बच्चे यह समझ पाते...और ओल्ड एज आश्रमों की जरूरत न पड़ती....

व्यथित करती पोस्ट...

vidhya 25 जुलाई 2011 2:39 pm  

आप का बलाँग मूझे पढ कर अच्छा लगा , मैं भी एक बलाँग खोली हू
लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

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Dinesh pareek 9 अगस्त 2011 8:49 am  

मुझे क्षमा करे की मैं आपके ब्लॉग पे नहीं आ सका क्यों की मैं कुछ आपने कामों मैं इतना वयस्थ था की आपको मैं आपना वक्त नहीं दे पाया
आज फिर मैंने आपके लेख और आपके कलम की स्याही को देखा और पढ़ा अति उत्तम और अति सुन्दर जिसे बया करना मेरे शब्दों के सागर में शब्द ही नहीं है
पर लगता है आप भी मेरी तरह मेरे ब्लॉग पे नहीं आये जिस की मुझे अति निराशा हुई है
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

veerubhai 15 अगस्त 2011 1:03 pm  

भाव विभोर कर गई यह पोस्ट ,"बाप "एक निस्स्वार्थ छाता होता है जो जीवन के झंझावातों से बचाए रहता है .और जो इस सुख से वंचित हैं वही इस सुरक्षा कवच के न होने का अर्थ समझ सकते है .आपकी द्रुत प्रतिक्रया के लिए आभार .
यौमे आज़ादी की सालगिरह मुबारक .
http://veerubhai1947.blogspot.com/

रविवार, १४ अगस्त २०११
इसके जिन्होनें पढ़ा है .....


http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/
Sunday, August 14, 2011
चिट्ठी आई है ! अन्ना जी की PM के नाम !

Maheshwari kaneri 16 अगस्त 2011 1:22 pm  

भाव विभोर करती मार्मि्क पोस्ट ,"

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri 24 अगस्त 2011 2:34 pm  

बहुत ही भावपूर्ण मार्मिक लेख ...हमे आने वाली पीड़ी को स्वयं आदर्श ब्यवहार प्रस्तुत करके माता पिता बुजर्गों की सेवा करने की विरासत सौंपनी होगी.....सुन्दर आलेख के लिए आभार !!!

Maheshwari kaneri 24 अगस्त 2011 8:46 pm  

भावपूर्ण मार्मिक लेख ...सुन्दर...

पोस्ट को पढ़ने के लिये नीचे कृपया लिंक पर क्लिक करें -

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