नेता बोले तो सब ठीक, जनता बोले तो कैरेक्टर ढीला है
जरा सी सच्चाई की पोल क्या खोल दी, अपनी खाल से बाहर ही निकल आए वे। अब बड़े हो दिल्ली के गोलघर में बैठते हो तो इसका मतलब यह तो नहीं कि आपकी खाल किसी टैन्ट हाऊस का विशाल तिरपाल हो गई। अभिनेता ने जो कहा, वो नेता को बुरा लग गया। अब नेता जो कह रहे हैं उससे अभिनेता को भी तो बुरा लग रहा होगा। शायद नेता और अभिनेता दोनों सच बोल रहे हैं । सच बोलना बिल्कुल सरल है, क्योंकि सच कड़वा होता है, तीखा होता है, इसके लिए इसमें मसालों को मिलाए जाने की जरूरत भी नहीं है।
आप जहरीले हो, भ्रष्ट हो, आपसे आपके वोटर त्रस्त हैं, आपके कारनामे जगजाहिर हैं, फिर भी आप खुद को सर्वोपरि समझते हैं, इसलिए ऐसी चीख चिल्लाहट मचाना तो स्वाभाविक ही है। आप जो हैं और आपको वही कह दिया गया है तो बौरा गए। आप कह रहे हैं पीकर बोल रहा था। आपने खाने के लिए कुछ छोड़ा ही कहां ? क्या खाकर आपके खिलाफ कोई बोलेगा। गनीमत कहिए कि पीकर बोल गया।
इसमें क्या गलत कहा गया कि वे परीक्षा पास करके संसद में दाखिल हों, इसमें बुरी बात क्या है, जो उन्हें इसमें भी अपना अपमान लगने लगा है। हर आदमी अपने आदमी की ही परीक्षाओं की तो चिंता करता है। नहीं पूछेंगे, मुश्किल सवाल, एबीसीडी सुन लेंगे, दस तक गिनती लिखवा लेंगे, एकाध जानवरों के चित्र पहचनवा लेंगे। इम्तहान तो दें कि डर का भूत सिर पर सवार है, फेल न हो जाएं। मतलब अपने सिर पर पड़ी तो भारी, अपनी खाल कटे तो आरी, वैसे कहते हैं कि अवाम ही है माई बाप। जीत कर या हार कर अथवा वोटरों को मार कर यानी किसी भी तरह सत्ता हथियाने वाले, संसद में घुस जाने वालों को कोई क्या कहे, वे खुद ही बतलायें। उनकी तारीफ में कौन सी उपमाएं गाई जाएं, अलंकार और अनुप्रास लगाए जाएं, वंदनवार सजाए जाएं। आप करें भ्रष्टाचार, आम जनता बिल्कुल बेबस और लाचार। इसी लाचारी में तो इनकी सफलता के सूत्र छिपे हैं। वे तरह तरह के घोटाले करते हैं, उन्हें घोटूं कहें तो कैसा लगेगा जी, ऐसे में शायद लिहाज में अनपढ़ कह लिया गया।
वोट फॉर नोट देख लीजिए, ये भी तो इनके भाई ही हैं, सगे नहीं तो क्या हुआ मौसेरे ही सही। इन्हें जब नोट दिए जा सकते हैं, ये अपने फायदे के लिए नोट दे भी सकते हैं, मतलब खरीदना और बेचना दोनों जायज। अगर सांसद गाहे बगाहे खुद ही आईना देख लिया करें तो उन्हें सच्चाई इतनी कड़वी नहीं लगा करेगी और वे सदा मीठा मीठा ही क्यों खाते रहना चाहते हैं। इतना मीठा खाओगे तो डायबिटीज हो जाएगी।
अपनी तारीफ तो सभी को भाती है, चाहे वो बिल्कुल झूठी ही क्यों न हो। तारीफ कर दी होती,समर्थन में बोल दिया होता, तो फूल कर गोल-गप्पा हो रहे होते। पूरे देश में मिठाई बंटवा देते। चैनल वाले और मीडिया इन्हें सुर्खियों में रखें तो ठीक, तब नहीं पूछते हैं कि सिर्फ हमारी खबरें ही क्यों, हम कौन से तीसमारखां हैं, जो हमें ही इतनी फुटेज। जब इन्हें इग्नोर कर दे, तो उनसे बुरा कोई नहीं है, सबसे बड़े दुश्मन। सच में जैसे नोट रखते हैं ये कारे कारे, उसी तरह इनके मन भी हैं कारे कजरारे।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकलता है कि वे चिल्लाएं तो सब ठीक, अवाम बोले तो कैरेक्टर ढीला है। जो बोल गए, उनका मामला अब गीला है। फिल्म में मुन्नी और शीला है। देश में रामलीला है। जिसे जो समझ में आ रहा है, बोले जा रहा है। देखिए हम भी क्या क्या बोल गए। आप भी हमें टिप्पणियों में जो चाहे कह दो जी। यही तो लोकतंत्र है, इसके बाद तो सब षडयंत्र है जी। नहीं क्या ?


21 टिप्पणियाँ:
अन्ना भाई ध्यान रहे कहीं ये लेख किसी सांसद ने पढ़ लिया तो अगला नंबर आपका ही समझो...
अच्छा है.. ओम पुरी और किरण बेदी पर कार्यवाही हो.. नेता लोगों की और पोल खुलेगी.. पर ये दोनों जनता की नज़र में और ऊँचे उठ जायेंगे..
अब तो हमें गाना पड़ेगा,"घूँघट के पट खोल रे तोहे 'नोटिस मिलेगा"!
वे संसद जैसे पवित्र मंदिर में लात-घूंसे चलायें,नोट उछालें,सवालों को बेंच दें,उत्तर 'स्पोंसर' कर दें,सब जायज है क्योंकि वे 'माननीय' हैं!
"भइया,ये सही नहीं है" एक ऐड की टैग लाइन !
सँसद के मान की बात करते हैं लेकिन संसद के अपमान में सबसे पहले तो स्वयं नेता ही हैं.
अच्छा हुआ रामलीला मैदान की जनता को माइक नहीं थमाया वरना तो इनकी सात पुश्तों का विशेषाधिकार हनन हो जाता
PYAR se ki hui DHULAI ..sarkar kare vo leela aur janta kare vo paap ...makhan lagakar mara hai sir aapne
पदमसिंह जी ने तो मेरे दिल की बात कह दी।
सॉंसद और संसद दोनों लोकतंत्रीय संविधान की दृष्टि से माननीय हैं इस पर तो दो मत हो नहीं सकते लेकिन मननीय बात यह है यह जनप्रतिनिधित्व का प्रश्न है। कितने सॉंसद स्वयं संसद की गरिमा का पालन करते हैं। क्या इन सॉंसदों को उस गरिमा व गंभीरता का अहसास है जो उनसे अपेक्षित होता है? क्या संसद कामेडी शो का मंच है? हॉं, गरिमा की सीमा का पालन करते हुए हास-परिहास और चुटकियों को आपत्तिजनक नहीं माना जा सकता है लेकिन कोई सॉंसद कामेडियन बन कर स्तरहीन बातें करे तो उसके प्रति कुछ कहने में मुझे नहीं लगता कि संसद की गरिमा भंग होती है। जिस जनता ने चुन कर भेजा है उसे तो संसद में हुए हर व्यवहार पर खुलकर टिप्पणी करने का स्वतंत्र अधिकार किसी भी लोकतंत्रीय संविधान की आवश्यकता है।
क्या हास्यास्पद नहीं कि जिस दल के प्रतिनिधित्व में सरकार चल रही हो वह विनम्रता दर्शाते हुए स्वीकार करे कि भ्रष्टाचार चल रहा है। अरे भाई, जब भ्रष्टाचार चल रहा है तो आपने क्या किया। सरकार आपकी है, जनता ने आपकी अक्षमता की पृष्ठभूमि सुनने के लिये नहीं, कुशलता से सरकार चलाने के लिये भेजा है। नहीं चला सकते हैं तो स्वीकार करें कि हमसे सरकार नहीं चलती और नमस्ते बोलें, संसद में क्या कर रहे हैं? जनता की बात संसद में रखने का दावा निरर्थक है यदि आप सरकार को दिशा नहीं दे सकते। सारी लोकतंत्रीय व्यवस्था का आधार मताधिकार है; मताधिकार का मुद्दों पर उपयोग न करते हुए सरकारें गिराने की बात करते रहे तो हो गया। सरकारें गिराना नहीं, सरकारों को सही दिशा में चलने के लिये बाध्य करना आवश्यक है और जो सरकार जनभावना के विरुद्ध चले उसका चरित्र जनता के सामने लाना आवश्यक है। अगर ऐसा नहीं कर सकते तो संसद में सांसद का व्यवहार निष्प्रभावी हो जाता है और ऐसे में संसद सदस्य को त्यागपत्र देने का अधिकार तो है ही उसका उपयोग न भी करे तो जनता को संसद के चरित्र के प्रति जागरूक न करने का क्या कारण है?
पुत्र ,पुत्री पिता सबका स्वागत .माता दादी का स्वागत नहीं
अनपढ़ हैं तो क्या हुआ तख्ती पास तो हैं
bahut achcha likhe.....
बिलकुल सही बात है जी ....
AANNA ko samarthan , aam admi ki sahi baat manch se uthane ke liye kiya gaya, phir Om Puri ka kyon nahi, unhone bhi aam admi ki baat manch se kahi, baat sach hai is liye kadwi to lagni hi thi. Sansadon ne jo kadam uthaya hai woh is kahavat ko charitharth karta hai " DHOBI SE JITO NAHI < GADDHE KE KAAN UMETHO "
सच्चाई तो कड़वी होती ही है .....इन्हें आइना दिखा दिया गया
बिलकुल सही चोट !
एकदम सही निशाना लगाया है।
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ये रंगीन चित्रावलियाँ।
कसौटी पर शिखा वार्ष्णेय..
बिलकुल सही, खुद तो दुनिया जहान के बारे में उल्टा-सुल्टा बोल सकते हैं और जनता कहे तो बुरा लगता है।
पते की बात
सही कहा. अगर वे आत्म मंथन कर ले तो सच समझ जायेंगे.
यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो कृपया मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html
बिलकुल सही निशाना ......
170 सांसद जहां किसी ना किसी केस में आरोपी हों उस संसद के सांसदों से क्या अपेक्षा हो सकती है ।
सांसद नकारे, भ्रष्ट उन्हें कुछ भी कहें कम है। लेकिन हमें अपनी भाषा की मर्यादा कभी नहीं छोडनी चाहिए। हम अपने चाल चलन से ही दूसरों से अलग दिखाई दे सकते हैं।
मैं किरन बेटी के इस कृत्य को फूहड और गैरजरूरी मानता हूं। ओमपुरी से सार्वजनिक रूप से माफी मांग ली है और कहा कि जो दो शब्द उन्होंने इस्तेमाल किए, उससे बेहतर शब्द इस्तेमाल किए जा सकते थे।
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