घर घर की सुरक्षा के मंत्री हैं क्या होम मिनिस्टर हमारे
वे इस बात की पूरी गारंटी ले रहे हैं कि हम कोई गारंटी नहीं ले सकते, आखिर वे देश के एचएम हैं और उनकी बात तो माननी ही होगी। आजकल के आतंकी फैशन के युग में इतना साफ सच कहना भी आसान नहीं है कि हम न तो आतंकी हमलों को रोक सकते हैं और न ही इन हमलों से किसी की जान बचा सकते क्योंकि हम इंसान हैं, भगवान नहीं हैं। अपनी जान बचा रहे हैं और संसद को बचा रहे हैं, क्या यह कम है। हमारी पुलिस जान ले सकती है और लेती रहती है। आप जिस विधि से चाहेंगे उसी विधि से, लाठियों से चाहेंगे तो लाठियों से और एनकाउंटर करवाना चाहेंगे तो एनकाउंटर करवा देंगे। पिछले दिनों जो किया है, वो मिसाले हैं। आप को तो खुद ही समझ जाना चाहिए। आप हमें पूछ पूछकर बेवजह तकलीफ दे रहे हैं। होम मंत्री हैं इसका मतलब यह तो नहीं है कि कोई जादूगर हैं और मंत्र सीखकर मंत्री बने हैं। न हम आतंकियों को इंवीटेशन कार्ड भिजवा रहे हैं, हां, अगर वे ई मेल भेजकर आ रहे हैं, तो क्या किया जाए, इतनी सारी ई मेल को देखना और समझना कोई आसान काम है।
एक फीमेल तो ढंग से देखी नहीं जा रही है, उसी का ख्याल रख रखकर हलकान हुए पड़े हैं और आप हमें इतना मुश्किल काम करने के लिए कह रहे हैं। हमने वोटर से वोट हथिया लिए, यह क्या कम जाबांजी का काम है। इतना आसान होता तो देश के सारे वोटर ही मंत्री नहीं बन गए होते। जो विपक्ष में हैं, वो भी तो जीतकर ही आए हैं, फिर भी मंत्री नहीं बन पाए हैं। विपक्ष में बैठकर मुंह चलाना अलग बात है, सरकार में घुसकर मंत्री बनना दूसरी बात। इन दोनों की तुलना आप एक तरह से कैसे कर सकते हैं, अगर कर सकते हैं तो समझ लीजिए कि आपका दिमाग फिर गया है। वैसे भी अगर आपका दिमाग न फिरा होता तो यूं घुमा फिरा कर हर बार हमें ही मंत्री बनाते। कभी कोई विभाग, कभी कोई मंत्रालय। जिसकी किस्मत में लिखा होता है, वही मंत्री बनता है और फिर पांच साल बना रहना कोई आसान है, उसके लिए भी बहुत तेज किस्मत चाहिए। हम अमर नहीं हैं और न बचने के लिए हमारे सिर पर सींग हैं।
होम मिनिस्टर बना दिया है हमें, पहले तो आपने बनाया नहीं है, पी एम ने बनाया है और पी एम ने भी खुद नहीं बनाया है, जिस किसी के इशारों पर बनाया है वो तो आप भी जानते हैं। तो हम उनकी और उनके घरों की सुरक्षा न करें। हम होम मिनिस्टर हैं कोई चौकीदार नहीं हैं, आपको यह साफ समझ लेना चाहिए। यह सुरक्षा गार्डों वाला बर्ताव किया जाना हमें बिल्कुल पसंद नहीं है। इसलिए बिल्कुल साफ कह रहे हैं कि आगे से कोई भंगस नहीं, कोई लफड़ा नहीं। कि सबकी सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हम। हमें नेता पब्लिक ने नहीं बनाया है, वो तो हमारा ही जिगरा है कि बन गए किसी भी तरह से लालच में फंसा कर, वोट हथिया कर। मत फंसते लालच में, कोई तुम्हारे एक वोट से हम नेता बनने से रह जाते, इस गलतफहमी में मत रहिएगा।
सब नेता मीठी बातों का प्रसारण करते हैं, दूसरों को उल्लू, गधा वगैरह बनाने से बाज नहीं आते हैं, आप क्या सोच रहे हैं कि हम वो मंत्र भूल गए हैं, जो मंत्री बनने के काम आते हैं। आप किसी को गुड़ मत दें परंतु बातें शहद सी मीठी जरूर करें, हमारा मोह भंग हो गया है इस तरह हमेशा झूठ बोल बोलकर। हमें मालूम है कि उन्हीं शहद सी मीठी बातों के मोह में सब चिपकते हैं और इसके परिणाम शत-प्रतिशत आते हैं। हमें यह भी मालूम है कि नेता बनने और बने रहने के लिए झूठ बोलना जरूरी है और हम भी जमाने से यही करते आ रहे हैं, पर अब नहीं करेंगे। साफ कह देते हैं कि हम नहीं रोक सकते आतंकी हमले। हम थोड़ी करवा रहे हैं कि उन्हें मना कर दें कि मत करो हमला, हमारे देश की रियाया चिल्ला रही है। वे अपना फर्ज निबाह रहे हैं और मुआवजा देने की घोषणाएं और दुर्घटनाओं की निंदा करके हम अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं। हमें मालूम है कि सच कड़वा होता है, सदा से आप सबको मीठा मीठा खाने की आदत पड़ गई है। आपकी मान लें कि झूठ के पांव नहीं होते लेकिन जब मंत्री बनते हैं तो वहां भी सच के गांव नहीं होते। पूरी संसद में किसी के पांव नहीं हैं और वो संसद है कोई गांव नहीं है।
एचएम की इस बतोलेबाजी पर सरकार में खूब प्रतिक्रिया हुई है, अपनों ने खूब बुरा बुरा कहा है। फिर बाहर वाले क्यों छोड़ेंगे, चैनलों ने अपने कार्यक्रम में विस्तार से इनकी क्लास ली है। इनकी खाल का एक एक बाल नोचा गया है पर वे नहीं जानते हैं कि इनकी खाल से मजबूत, न कछुए और न गैंडे अथवा मगरमच्छ की खाल होती है, इसलिए इनके चेहरे पर एक शिकन तक नहीं आई है।

7 टिप्पणियाँ:
सही लिखा है आपने| धन्यवाद|
शासन को सौ काम हैं, मन में राखो गोय ,
जहाँ-तहाँ बम फोड़ता, कहाँ बचायें तोय |
कहाँ बचायें तोय, धमाके होते अक्सर,
करो हिफाजत आप, यही है सबसे बेहतर |
चिदंबरम की चीख, बड़ा फोड़ू है अनशन,
बना प्राथमिक काम, बझा इसमें ही शासन ||
देखी रचना ताज़ी ताज़ी --
भूल गया मैं कविताबाजी |
चर्चा मंच बढाए हिम्मत-- -
और जिता दे हारी बाजी |
लेखक-कवि पाठक आलोचक
आ जाओ अब राजी-राजी |
क्षमा करें टिपियायें आकर
छोड़-छाड़ अपनी नाराजी ||
http://charchamanch.blogspot.com/
सही लिखा है आपने...सच कड़वा होता है...
FRIDAY-
http://charchamanch.blogspot.com/
एकदम सही और सटीक लिखा है आपने ...
भई , वे देश को चलाने के ठेकेदार हैं और हम,आप,आम अवाम इसमें नहीं आते !!
एक टिप्पणी भेजें