खुशियों को गिलहरी बनी रहने दें
| गिलहरी के साथ यह कौन गिलहरा है ? |
बंदर बन रहा था सिकंदर
चुनाव में हो गया अंदर
भालू आया, छुट्टी पर भेजा गया
...
अब आई है गिलहरी
नहीं होती है हरी
पर
आंखों को लगती है रसभरी
क्योंकि होती है ब्राउन
नहीं पहनती गाऊन
उछलती है कूदती है
पेड़ से जमीन
जमीन से पगडंडी
पगडंडी से फिर पेड़़
फिर देखकर आपको
झट से चढ़ जाती है
पेड़ की किसी शाख से
किसी शाख, पत्ते पर
दौड़ती नजर आती है
गिलहरी की सच्चाई है
खुशी उसमें समाई है
दुख की तनिक नहीं
रोशनाई दी दिखाई है
इसलिए सबके मन को
भीतर तक भाई है
वैसे वह बहन होती है
गिलहरी होती है
नहीं होता है गिलहरा
सुन रहे हैं न, ककहरा
देखते ही मन से बन जाती है
मन में खुशियों की रसभरी
हम सबकी प्यारी गिलहरी।
प्रस्तुतकर्ता अविनाश वाचस्पति पर 10:11 am
लेबल: अविनाश वाचस्पति, कविता, खुशियां, गिलहरी

4 टिप्पणियाँ:
ha ha ha so nice sir ..really awesm "khusiyo ki gilahari"
सोना (नींद) तो मुझे भी अच्छा नहीं लगता इसलिए ध्यान लगाता हूँ अशोकजी
बहुत सुन्दर सार्थक रचना। धन्यवाद।
bahut hi majedaar hone ke saath hi gilhari ke guno se bhar puur aapki post bahut bahut achhi lagi ,sir.(nanhi si pyaari gilahari ko dekh kar kisko khushi nahi hoti)
poonam
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