पिताजी

पिताजी
स्‍व. डॉ. दिनेश चन्‍द्र वाचस्‍पति

सोमवार, 20 फरवरी 2012

पिता पुत्र और गैजेट्स मोह (लघुकथा)


पिता मरणासन्‍न नहीं थे परंतु गंभीर रोग से पीडि़त थे। स्‍वस्‍थ होने की उम्‍मीद 75 और 25 थी। 75 चिकित्‍सकों की राय में और 25 निजी परिवार जनों की। पुत्र रोजाना कमाकर पेट भरने वाला लेकिन पिता के होते बिल्‍कुल निश्चिंत। विवाह हो चुका था। खुश या मस्‍त था सिर्फ अपने में।


पिता चाहे बुजुर्ग थे परंतु तकनीक से पूरी तौर पर जुड़े हुए। तकनीक में प्रगति हो और वे बिना जाने-अपनाए रह जाएं, संभव ही नहीं था। आधुनिक स्‍मार्ट आई फोन तभी से रखते थे जब भारत में उसका कोई नाम नहीं जानता था। कंप्‍यूटर और लैपटाप जब भारत में आए थे, तब से वे आई पैड और टेबलेट इस्‍तेमाल कर रहे थे। दूसरा पुत्र अभी कॉलेज में ही पढ़ रहा था। पहले ने तो स्‍कूल से ही पढ़ाई से मुंह ऐसा मोड़ा था कि कभी किसी और कभी किसी बहाने से स्‍कूल भी नहीं गया। उसकी अपनी जिद्द थी। जिद्दी न होता तो पढ़ लिखकर जरूर अधिकारी बन गया होता। जिद्दी के साथ ही कुसंगति ने मति हर ली थी। नेट इंटरनेट से कोई बचा नहीं था। दूसरा अभी पढ़ने में जुटा तो था लेकिन जीवन की मौज मस्‍ती का पूरा आनंद लेता हुआ।
पिता के प्रत्‍येक गैजेट पर दोनों पुत्रों की नजर थी। सोच रहे थे कि बाद में एपल का आई फोन तो मैं ही लूंगा और एक की निगाह टेबलेट पर थी। बैंक खाते पर तो सबकी निगाह थी। बस वे यह जाहिर नहीं कर पाते थे परंतु मन में तो था ही।

दूसरे पुत्र की निगाह पिता की नौकरी पर भी थी। उम्‍मीद थी कि कुछ न कुछ करके उस नौकरी को सांत्‍वना के आधार पर हथिया ही लेगा। लेकिन सबके विश्‍वास पर तब तुषारापात हो गया जब पिता खुद कार ड्राइव करके अस्‍पताल से सीधे घर पहुंच गए थे। किसी को फोन पर भी सूचित नहीं किया और चिकित्‍सकों को पहले ही मना कर दिया था। पिता के आने से घर में सब शोकाकुल नजर आ रहे थे, सिर्फ उनकी पुत्रवधू, बिटिया और धर्मपत्‍नी के सिवाय। सिर्फ ये ही पिता, पति के सकुशल घर लौटने के मन में जो विश्‍वास था, उसे पूरा देखकर खुश थीं।  परिवार में भाई और उनके परिवार भी लगता है आस खो चुके थे पर उनके पास आस होती तो खोते।

11 टिप्पणियाँ:

Sushil 21 फरवरी 2012 8:55 am  

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जो उनके मन में है उसे उनके में रहने दो पिताजी
अपने मन की आस को निराश ना करो इतना पिताजी
पिता का फर्ज निभाना ही पड़ेगा बने हो जब पिताजी
होता वही है जो होता है मंजूरे खुदा जान लो पिताजी
पत्नी बहू पुत्री की खुशी है तो सही हिम्मत करो पिताजी
जमाने में बहुत कुछ अभी और होना है इतने से ना डरो पिताजी।

काजल कुमार Kajal Kumar 21 फरवरी 2012 9:18 am  

विजय तेंदुलकर का एक प्रसिद्ध नाटक है 'गिधाडे' (हिंदी में गिद्ध नाम से). पढ़ते हुए उसकी याद हो आई.

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 21 फरवरी 2012 9:36 am  

कितनी सच्चाई है (कडुवी ही सही ) इस कहानी में... सादर

सुमित प्रताप सिंह 21 फरवरी 2012 11:51 am  

ऐसा क्या?

संगीता स्वरुप ( गीत ) 21 फरवरी 2012 12:51 pm  

अपने अपने स्वार्थ ...

वन्दना 21 फरवरी 2012 4:08 pm  

ये भी आज का यथार्थ है ……………और आज हर किसी को इतना जिगरा तो रखना ही चाहिये ताकि आने वाली पीढी को एक नया सबक मिले और इस तरह की मतलबी आस रखना बंद कर दें।

ajit gupta 21 फरवरी 2012 6:42 pm  

दुनिया इसी का नाम है।

Atul Shrivastava 22 फरवरी 2012 10:34 pm  

दुनिया में हर तरह के लोग होते हैं

अभिषेक मिश्र 22 फरवरी 2012 11:55 pm  

सुन्दर लघुकथा. कुछ लोगों को खुशी भी हुई, जानकर अच्छा लगा...

SM 13 मार्च 2012 4:15 pm  

बहुत बढ़िया प्रस्तुति

amrendra "amar" 20 मार्च 2012 10:34 am  

ye duniya hai aur yaha her koi apne apne tarke se jeena chahta hai......
behtreen lekhn ke liye badhai

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